बुधवार, 18 अप्रैल 2018

ल्ल ! हो गईल चार..!

एक रात जब एक पहरेदार ने सुबह चार बजे की सुचना घंटा बजा कर दी, तो दूसरे ने पूछा, का हो, मिसिर ! केतना बजइले ? पहला बोला, चार ! पर हम तो तीन ठो सुनले हईं ! पहला बोला।  अरे नाहीं, पूरा गिन के चार बार बजइले हईं !  दूसरा, अरे बुड़बक, तीन बार बजइले हउआ, फजिर में बड़ा साब निकाल बाहिर करीहें। अब पहला घबड़ा गया उसे लगा की गल्ती हो गयी है ! उसने मुगदर उठाया और दन्न से घंटे पे दे मारा....,ल्ल ! हो गईल चार.............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
कभी-कभी दिलो-दिमाग पर पड़ी किसी हल्की सी दस्तक से कोई ऐसी याद कपाट खोल सामने आ जाती है जो बरबस तन-बदन को तरंगित कर मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। कल रात सोते समय पता नहीं कैसे-कैसे, क्या-क्या लिंक जुड़ते गए जो धीरे-धीरे मुझे सत्तर के दशक में खींच कर ले गए। अपना बचपन, उस से जुड़े लोग, उनका भोलापन, बड़े लोगों की दयालुता-दानिश्ताई सब जैसे सजीव सा होता चला गया। उसी समय के दो-तीन प्रसंग पेश हैं जो आपके चहरे पर भी मुस्कान बिखेर देंगे। 
एस्प्लेनेड के खादी भवन पर लगी घडी 

हर की पौड़ी का टॉवर क्लॉक 
उन दिनों हाथ-घड़ियाँ आम नहीं हुआ करती थीं। समाज का ख़ास वर्ग ही उनका उपयोग किया करता था। आज
यह जान कर अजीब लगे पर निम्न आय और मजदूर वर्ग तो शायद सोचता भी नहीं था घडी लेने के बारे में। लोगों की सहूलियतों के लिए शहरों-कस्बों के बड़े चौराहे पर बड़ी-बड़ी घड़ियाँ मीनार पर या ऊँची इमारतों पर लगाई जाती थीं। अभी भी ऐसी घड़ियाँ छोटे-बड़े शहरों में देखी जा सकती हैं। इसके अलावा कामगारों की सहूलियत के लिए  कल-कारखानों के साथ-साथ कई जगह रात के समय गजर, जिसे घंटा कहा जाता था, बजाने की परंपरा भी थी। यह एक लोहे का बड़ा सा, भारी आयताकार टुकड़ा होता था जो एक हुक से दोलायमान अवस्था में लटका रहता था इस पर सयानुसार एक लोहे के हथौड़े से चोट कर समय बताया जाता था, जैसे दो बजे, दो प्रहार कर, तीन बजे, तीन प्रहार कर। यह क्रम रात के ग्यारह बजे से शुरू हो सुबह के चार बजे तक हर घंटे, समय के अनुसार चलता था। 
गंगा का किनारा, जहां बचपन बीता ! 

घर गंगा किनारे वाले 
हमारी फैक्ट्री #Reliance Jute & Ind. ltd., का रिहाइश वाला हिस्सा ठीक गंगा नदी के किनारे पर था। वहाँ कोई दिवार वगैरह नहीं थी। उन दिनों चोरी-चकारी का उतना डर नहीं था फिर भी रात दस बजे से सुबह पांच बजे तक दो दरबानों (Guard) की ड्यूटी वहाँ लग जाया करती थी। उन्हीं पर रात को हर घंटे गजर बजाने का भी जिम्मा रहता था। कारखाने का तैयार माल-असबाब, रेल-सड़क और जल-मार्ग तीनों से बाहर भेजा जाता था। इसलिए नदी पर "जेटी" भी बनी हुई थी, जो घरों के पास ही थी। फैक्ट्री में गजर दो जगह बजाया जाता था; एक तो मेन-गेट पर, दूसरा जेटी पर। तो एक रात जब एक पहरेदार ने सुबह चार बजे की सुचना घंटा बजा कर दी, तो दूसरे ने पूछा, का हो, मिसिर ! केतना बजइल ? पहला बोला, चार ! पर हम तो तीन ठो सुनले हईं ! पहला बोला।  अरे नाहीं, पूरा गिन के चार बार बजइले हईं !  दूसरा, अरे बुड़बक, तीन बार बजइले हउअ, फजिर में बड़ा साब निकाल बाहिर करीहें। अब पहला घबड़ा गया उसे लगा की गल्ती हो गयी है ! उसने मुगदर उठाया और दन्न से घंटे पे दे मारा।... ल्ल ! हो गईल चार। दोनों जने संतुष्ट हो खैनी रगड़ने लगे।   
जेटी 

इसी तरह के होते थे गजर 
फिर ?
फिर क्या ! उधर चीफ-इग्ज़ेक्युटिव डागा जी अपने बंगले में जाग चुके थे। उन्होंने जब एक घंटे की आवाज सुनी तो चौंके कि अभी तो चार बजे थे पांच मिनट बाद ही एक कैसे बज गया ? घडी देखी तो सुबह के चार बज के पांच मिनट हुए थे। उस समय तो उन्होंने किसी को नहीं बुलाया पर सुबह छह बजे आफिस पहुंचते ही जेटी पर के उन दरवानों को बुला भेजा। दोनों जने डरते-कांपते हाजिर हुए ! सारी बात बतला सर झुकाए खड़े रहे। आगे से ध्यान रखने की हिदायत और जाने की इजाजत पा दोनों भगवान को धन्यवाद देते हुए भाग खड़े हुए। थोड़ी ही देर में यह बात पूरी मिल में फ़ैल गयी और दोनों जने हफ़्तों मुंह बचाते लुकते-छिपते रहे, खासकर हम बच्चों से.......!
*कल फिर मिसिर जी की पेशी 

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

"राघवयादवीयम्" एक अद्भुत ग्रंथ

कवि वेंकटाध्वरि रचित ‘राघवयादवीयम्’ एक विलक्षण ग्रंथ है। इस ग्रंथ की विशेषता और अद्भुत खासियत यह है कि इसमें के 30 श्लोकों को अगर सीधे-सीधे पढ़ते जाएं, तो रामकथा बनती है, पर उन्हीं श्लोकों को उल्टा यानी विपरीत क्रम में पढ़ने पर वह कृष्ण-कथा बन जाती है। श्री राम और कृष्ण दोनों के संयुक्त नामों से इस रचना का नामकरण किया गया है। राघव रघु-कुल में जन्मे राम के महाकाव्य रामायण से है और यादव, यदु-कुल में जन्में कृष्ण जी के भागवत को संदर्भित करता है.......! 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
हमारा देश अप्रतिम विचित्रताओं, अनोखी परम्पराओं, दुर्लभ सम्पदाओं,  विलक्षण प्रतिभाओं, अमूल्य धरोहरों से भरा पड़ा है। सबके बारे में जानने-समझने में अच्छी-खासी उम्र भी कम पड़ जाए।       
ऐसे ही इसे विश्व गुरुवत्व का पद प्राप्त नहीं हो गया था। पर आज उत्तम और उचित शिक्षा के अभाव में ज्ञान के बदले सिर्फ आधी-अधूरी जानकारियों की उपलब्धता से उत्पन्न अज्ञानता, अदूरदर्शिता या विदेश-परस्ती के कारण हम अपने उज्जवल अतीत पर ही विश्वास न कर पश्चिम का मुंह जोहने लगे हैं।  पर कभी-कभी अज्ञानता के आकाश पर छाए अंधकार पर किसी विद्वान की विलक्षण प्रतिभा की चमक अपनी कौंध से ऐसा प्रकाश बिखेर जाती है कि लोगों की आँखें चौंधिया कर खुली की खुली रह जाती हैं। आज एक ऐसे ही विलक्षण कवि की अद्भुत रचना की जानकारी प्रस्तुत है, जिसको यदि साक्षात पढ़ा या देखा ना जाए तो विश्वास करना मुश्किल है। विद्वान हैं वेंकटध्वरी तथा उनकी अलौकिक रचना का
नाम है  "राघवयादवियम"; श्री राम और कृष्ण दोनों के संयुक्त नामों से इस रचना का नामकरण किया गया है। राघव रघु-कुल में जन्मे राम के महाकाव्य रामायण से है और यादव, यदु-कुल में जन्में कृष्ण जी के भागवत को संदर्भित करता है. जिसे सीधा पढ़ा जाए तो राम की  रामायण कथा  और उल्टा पढ़ा जाए तो कृष्ण की भागवत कथा का वर्णन होता है। अद्भुत है यह रचना और धन्य है इसका रचनाकार, जिसकी विलक्षणता का दुनिया में कोई सानी नहीं है।  
कांचीपुरम के 17वीं शती के कवि वेंकटाध्वरि, जिनको अरसनपलै वेंकटाचार्य के नाम से भी जाना जाता है, 
द्वारा रचित ग्रंथ ‘राघवयादवीयम्’ एक अद्भुत ग्रंथ है। इस को अनुलोम-विलोम काव्य’ भी कहा जाता है। इसको पढ़ कर रचनाकार की संस्कृत की गहन जानकारी, भाषा पर आधिपत्य, अपने विषय में निपुणता और कार्यपटुता का एहसास हो जाता है। इस तरह की रचना कोई महा विद्वान और ज्ञानी विज्ञ ही कर सकता है। इस  इस ग्रंथ की विशेषता और अद्भुत खासियत यह है कि इसमें के 30 श्लोकों को अगर सीधे-सीधे पढ़ते जाएंतो रामकथा बनती है, पर उन्हीं श्लोकों को उल्टा यानी विपरीत क्रम में पढ़ने पर वह कृष्ण-कथा बन जाती है। वैसे तो इस ग्रंथ में केवल 30 श्लोक हैं, लेकिन विपरीत क्रम के 30 श्लोकों को भी जोड़ लेने से  60 श्लोक हो जाते हैं। पुस्तक के नाम, राघवयादवीयम, से ही यह प्रदर्शित होता है कि यह राघव (राम) और यादव (कृष्ण) के चरित को बताने वाली गाथा है । 

उदाहरण स्वरुप पुस्तक का पहला श्लोक हैः-
                                 अनुलोम :
वंदेऽहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा यः । 
रामो रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे  1 
अर्थातः मैं उन भगवान श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं जो जिनके ह्रदय में सीताजी रहती है तथा जिन्होंनेअपनी पत्नी सीता के लिए सहयाद्री की पहाड़ियों से होते हुए लंका जाकर रावण का वध किया तथा वनवास पूरा कर अयोध्या वापिस लौटे। 
विलोम :
सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोराः 
यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वन्देऽहं देवम्  1 
अर्थातः मैं रूक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करता हूं जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरातों की शोभा हर लेती है। 

इस ग्रंथ की रचना महान काव्यशास्त्री श्री वेंकटाध्वरि के द्वारा की गयी थी। जिनका जन्म कांचीपुरम के निकट अरसनपलै नाम के ग्राम में हुआ था। बचपन में ही दृष्टि दोष से बाधित होने के बावजूद वे मेधावी व

कुशाग्र बुद्धि के धनी थे। उन्होंने वेदान्त देशिक का, जिन्हें वेंकटनाथ (1269–1370) के नाम से भी जाना जाता है  तथा जिनकी "पादुका सहस्रम्" नामक रचना चित्रकाव्य की अनुपम् भेंट है, अनुयायी बन काव्यशास्त्र में महारत हासिल कर 14 ग्रन्थों की रचना की, जिनमें 'लक्ष्मीसहस्रम्' सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। ऐसा कहते हैं कि इस ग्रंथ की रचना पूर्ण होते ही उनकी दृष्टि उन्हें वापस प्राप्त हो गयी थी। उनके विषय में अभी विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है पर खोज जारी है। 

"राघवयादवीयम्" एक ऐसा ग्रंथ है जिसका दुनिया-जहान में कोई जोड़ या जवाब नहीं है। इसके रचनाकार को शत-शत प्रणाम आज कुछ विदेश-परस्त, तथाकथित विद्वान संस्कृत को एक मरती हुई भाषा के रूप में प्रचारित कर अपने आप को अति आधुनिक सिद्ध करने में

प्रयास-रत हैं। क्या कभी उन्होंने ऐसे अद्भुत ग्रंथों के बारे में सुना भी है ? ऐसे लोग एक बार इसका अवलोकन करें और फिर बताएं कि क्या ऐसा कुछ अंग्रेजी में रचा जा सकता है ? 

आज जरुरत है इस तरह की अद्भुत रचनाओं को अवाम के सामने लाने की जिससे समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत की विलक्षणता से सभी परिचित हो सकें, उसके महत्व को समझ सकें, उसकी सक्षमता से परिचित हो सकें। आज इसका अंग्रेजी में भी अनुवाद उपलब्ध है।   

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

'ठ' से 'ठठेरा' ! कौन है यह ?

युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा सारा ध्यान उन पर ही अटक कर रह गया और मैं यथासंभव उनके साथ ही चलने लगा। कुछ ही देर में "ट वर्ग" की बारी आ गयी। युवक के 'ठ' से 'ठठेरा' बतलाने और बालक द्वारा उसका अर्थ पूछने पर युवक ने बताया, यूटेंसिल्स का काम करने वाले को हिंदी में ठठेरा कहते हैं.... !
#हिन्दी_ब्लागिंग 
कल पार्क में घूमते हुए एक बाप-बेटे की बातचीत के कुछ ऐसे अंश मेरे कानों में पड़े कि मैं सहसा चौंक गया ! युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा सारा ध्यान उन पर ही अटक कर रह गया और मैं यथासंभव उनके साथ ही चलने लगा। कुछ ही देर में "ट वर्ग" की बारी आ गयी। युवक के 'ठ' से 'ठठेरा' बतलाने और बालक द्वारा उसका अर्थ पूछने पर युवक ने बताया, यूटेंसिल्स का काम करने वाले को हिंदी में ठठेरा कहते हैं। यह अर्थ आज की पीढ़ी के अधिकांश लोगों को पता नहीं होगा ! बालक की ठठेरा-ठठेरा की रट सुनते हुए मैं उनसे आगे निकल गया। 
सच बताऊँ तो मुझे पता नहीं था कि पचासों साल पहले पुस्तक की तस्वीर में एक आदमी को बर्तन के साथ बैठा दिखा हमें पढ़ाया गया 'ठ' से 'ठठेरा' अभी तक वर्णमाला में कायम है ! ज़रा सा पीछे लौटते हैं ! पंजाब का फगवाड़ा शहर ! बालक रूपी मैं, अपने ददिहाल गया हुआ था। शाम को काम से लौटने पर दादाजी मुझे बाजार घुमाने ले जाते थे। उन दिनों वहाँ बाजार के अलग-अलग हिस्सों में एक जगह, एक ही तरह की वस्तुओं की दुकाने हुआ करती थीं। जैसे मनिहारी की कुछ दुकाने एक जगह, कपड़ों की एक जगह, आभूषणों की एक जगह वैसे ही बर्तनों का बाजार में अपना एक हिस्सा था, उसे ठठेरेयां दी गली या ठठेरा बाजार कहा जाता था। उसके 
शुरू होते ही पीतल, तांबे, कांसे के बर्तनों पर लकड़ी की हथौड़ियों से काम करते लोग और उनसे उत्पन्न तेज और कानों को बहरा  कर देने वाली ठक-ठन्न-ठननं-ठक-ठन्न की लय-बद्ध आवाजें एक अलग ही समां बांध देती थीं। यह ठठेरों के साथ मेरा पहला परिचय था। तब से सतलुज में काफी पानी बह गया है। तांबे-पीतल-कांसे के बर्तन चलन से बाहर हो चुके हैं ! कांच-प्लास्टिक-मेलामाइन-बॉन चाइना का जमाना आ गया है, ऐसे में तब ठठेरों का क्या हुआ ?


यही सोच कर जब हाथ-पैर मारे तो हैरत में डालने वाली जानकारी सामने आई। पता चला कि ठठेरा एक हिन्दू जाति है, जो परम्परागत रूप से चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, अग्निवंशी राजपूत हैं; जो अपने को सहस्त्रबाहु का वंशज मानते हैं। इनके अनुसार जब परशुराम जी ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का प्रण लिया तो बहुतेरे लोगों ने अपनी पहचान छुपा बर्तनों का व्यवसाय शुरू कर दिया। जो आज तक चला आ रहा है। कुछ लोग अपने को मध्यकालीन हैहय वंशी भी कहते हैं। कुछ भी हो आज इस कारीगर, शिल्पकार, दस्तकार शिल्पियों की पहचान विश्व भर में हो गयी है, जब 2014 में यूनेस्को ने इनके कांसे और ताम्र शिल्प को भारत की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दे दी। करीब 47 उपजातियों में अपनी पहचान कायम रखे ये लोग वैसे तो देश-दुनिया में हर जगह के निवासी हैं पर मुख्यता इनका वास पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व राजस्थान है। 




तो आज से जब भी "ठ" से "ठठेरा" पढ़ने या उसका अर्थ बतलाने का संयोग हो तो एक बार उनके समृद्ध इतिहास का स्मरण जरूर कर लें। 

रविवार, 8 अप्रैल 2018

फिल्म "हिंदी मीडियम" असली जीवन में मंचित हुई, दिल्ली में

पिछले साल एक फिल्म "हिंदी मीडियम" आई थी। जिसमें एक धनाढ्य व्यक्ति खुद को गरीब तबके का साबित कर अपने बच्चे को एक प्रतिष्ठित स्कूल में, आरक्षित कोटे के अंतर्गत दाखिल करवा देता है। पर दिल्ली के इन महाशय ने यह कारनामा फिल्म आने के चार साल पहले ही कर दिया था। अभी तक कई बार ऐसा सुनने में आया है कि अपराधी ने पकडे जाने पर अपने अपराध को किसी फिल्म से प्रेरित होना बताया है। पर यहां तो उल्टा हुआ है ! रियल लाइफ के नाटक को सालों बाद रील लाइफ में तब्दील किया पाया गया। कहीं  "हिंदी मीडियम" फिल्म बनाने वालों को इस हेरा-फेरी की भनक तो नहीं लग गयी थी........
#हिन्दी_ब्लागिंग 
भले ही हम कितना भी नकारें पर यह दुखद व कड़वा सच है कि हेरा-फेरी, धोखा-धड़ी, जुगाड़ जैसी विधाएं हमारे "गुणों" में शामिल हैं। हम सदा दूसरों को ईमानदार, सच्चा, नेक और आदर्श इंसान देखना चाहते हैं, किसी में जरा सी बुराई देखते ही उस पर राशन-पानी ले पिल पड़ते हैं, पर जब खुद के स्वार्थ या लाभ की बात होती है तो हमें कुछ भी गलत या अनैतिक नहीं लगता।  
वर्षों से पढ़ते-सुनते आए हैं कि बच्चों को संस्कार देना माता-पिता का फर्ज है जिससे वे एक जिम्मेदार नागरिक बन सकें। पर जो अभिभावक खुद ही कुकर्मों में लिप्त हों, जिनके लिए अपनी स्वार्थ-पूर्ती ही अभीष्ट हो, वे क्या आदर्श, शिक्षा या नैतिकता का पाठ पढ़ाएंगे अपने नौनिहालों को ? जो बच्चा बचपन से ही झूठ, धोखा-धड़ी, भ्रष्टाचार के माहौल में पलेगा-बढ़ेगा वह बड़ा होकर देश व समाज के हित को तो पैरों की ठोकर पर ही रखेगा ना !
    
आज एक विचित्र अनुभव हुआ जब अखबार में दिल्ली के एक व्यवसाई की करतूत पढ़, पिछले साल मई में आई "हिंदी मीडियम" फिल्म की याद आ गयी। जिसमें एक धनाढ्य व्यक्ति खुद को गरीब तबके का साबित कर अपने बच्चे को एक प्रतिष्ठित स्कूल में, आरक्षित कोटे के अंतर्गत दाखिल करवा देता है। पर इन महाशय ने यह कारनामा फिल्म आने के चार साल पहले ही कर दिया था। पकड़ाई में भी तब आए  जब अपने दूसरे बच्चे को भी उसी तरह वहां दाखिल करवाने का जुगाड़ भिड़ा रहे थे।  
दिल्ली के राजनयिक इलाके, चाणक्यपुरी में एक बहुत ही प्रतिष्ठित, नामी-गिरामी, विख्यात नर्सरी से लेकर बाहरवीं तक का CBSC से सम्बद्धित एक विद्यालय है, जिसका नाम संस्कृति स्कूल है। इसे ख़ास तौर पर सरकारी, सैन्य तथा विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के बच्चों के लिए बनाया गया है। इसकी गिनती देश के बेहतरीन स्कूलों में की जाती है। इसका संचालन एक NGO के द्वारा किया जाता है जिसका गठन वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की पत्नियों ने किया है। इसमें कुछ सीटें, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को भी अच्छी शिक्षा दिलाने के उद्देश्य से आरक्षित रखी गयीं हैं। 
अब आज की खबर ! दिल्ली का एक धनाढ्य व्यवसाई, अब नाम क्या लेना, जिसका अपने MRI सेंटर के साथ-साथ अनाज इत्यादि का थोक का व्यवसाय है। जो बीसियों बार विदेश भ्रमण कर चुका है। उसने 2013 में अपने बड़े बेटे को, नकली कागजातों, गलत आय विवरण और खुद को अपने ही MRI सेंटर का कर्मचारी तथा घर के पते में, अपने बंगले की जगह चाणक्यपुरी के पास की बस्ती संजय कैम्प का उल्लेख कर संस्कृति स्कूल में दाखिल करवा दिया था। पांच साल निकल गए, किसी को हेरा-फेरी की भनक तक भी नहीं लगी।  शायद लगती भी नहीं ! पर अपनी पुरानी तिकड़म से कइयों को बेवकूफ बना विश्वास के अतिरेक में डूबा, अपनी "चतुराई" पर इतराता यह इंसान, इस साल अपने छोटे बेटे को, भाई-बहन वाले कोटे के अंतर्गत दाखिला दिलवाने फिर वहीँ पहुँच गया। पर कहते हैं ना कि अपराध कभी ना कभी सामने आ ही जाता है; तो इस बार स्कूल के संचालकों को कागजों पर शक हुआ। छानबीन के दौरान सारी बातें सामने आ गयीं। नतीजा बाप को तो जेल हुई ही, तीसरी क्लास में पढ़ रहे उसके बड़े लड़के को भी स्कूल से निकाल दिए जाने के कारण उसका भविष्य भी अंधकारमय हो गया !  क्या चाहता था यह आदमी ? क्यूँ किया उसने ऐसा ? क्या सिर्फ अपने को चतुर साबित करने के लिए ? एक बार भी उसके दिमाग में यह बात नहीं आई कि सच सामने आने पर उसके बच्चों का भविष्य क्या होगा ? और तो और जब बच्चों को अपने पिता की इस करतूत का पता चलता तो क्या होता ?
अभी तक कई बार ऐसा सुनने में आया है कि अपराधी ने पकडे जाने पर अपने अपराध को किसी फिल्म से प्रेरित होना बताया है। पर यहां तो उल्टा हुआ है ! रियल लाइफ के नाटक को सालों बाद रील लाइफ में तब्दील किया पाया गया। क्या यह संयोग था या कहीं "हिंदी मीडियम" फिल्म बनाने वालों को इस हेरा-फेरी की भनक तो नहीं लग गयी थी ?

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

समय की पाबंदगी, आज एक संस्मरण, श्रीमती जी की जुबानी

शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था....!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 
मेरे स्कूल का घर से पैदल पांच-सात मिनट का रास्ता था। ऐसा माना जाता है कि नजदीक वाले ही ज्यादातर विलंब से पहुंचते हैं। पर मुझे शायद ही कभी देर हुई हो। देख-सुन कर अच्छा लगता था जब लोग कहते थे कि मिसेज शर्मा के आने पर अपनी घडी मिलाई जा सकती है। समय की पाबंदगी मुझे अपने पापा से विरासत में मिली थी। यह संयोग ही था कि मेरे ससुराल में भी हर काम घडी की सुइयों के साथ चलता था। वहां तो बाबूजी के काम के साथ जैसे घडी को चलना पड़ता था। शर्मा जी भी समय के पूरे पाबंद हैं, लेट-लतीफी उन्हें ज़रा भी पसंद नहीं है। इसी पाबंदगी के कारण हमारे दोनों परिवारों का पहला परिचय भी लोगों के लिए एक उदाहरण बन गया था।

बात मेरी शादी के समय की है। दिसंबर का महीना था। दिल्ली की ठंड अपने चरम पर थी। इसी को देखते हुए स्वागत समारोह छह बजे शाम का और रात्रि भोज का समय सात बजे का रखा गया था। शादी-ब्याह में बेचारे समय को कौन पूछता है, खासकर पंजाबियों के यहां तो दो-तीन घंटे की बात कोई मायने ही नहीं रखती, ना ही उभय-पक्ष इस पर ध्यान देते हैं। पर उस समय हम सब आश्चर्य चकित रह गए जब ठीक छह बजे बारात दरवाजे पर आ खड़ी हुयी। थोड़ी हड़बड़ी तो हुई पर साढ़े आठ बजते-बजते पंडाल तकरीबन खाली हो चुका था। आदतन देर से आने वाले दोस्त-मित्रों को शायद पहली बार ऐसे "समय" से दो-चार होना पड़ा था। इस बात पर मेरी सहेलियां शर्मा जी से अक्सर मजाक में कहती रहीं कि आप को बड़ी जल्दी थी दीदी को ले जाने की। 

आज बच्चे बड़े हो गए हैं, समझदार हैं, फिर भी उन्हें समझाते रहती हूँ कि समय की कीमत को समझो, इस बेशकीमती चीज की कद्र करो, इसे फिजूल बरबाद न करो, यह एक बार गया तो फिर कभी हाथ नहीं आता !आता है तो सिर्फ पछतावा। मुझे ख़ुशी है कि बच्चे भी इस परंपरा को चलाए रख रहे हैं। इस बात को मैं सदा अपने छात्रों को समझाती रही हूँ और मुझे ख़ुशी है कि मेरी बात को किसी ने अनसुना नहीं किया। इसके लिए प्रभु की शुक्रगुजार हूँ। 

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

गुड़ फ्राइडे यानी पावन शुक्रवार

आज  गुड़फ्रायडे की छुट्टी थी । सुबह- सुबह   एक सज्जन का फोन आ गया।  छूटते ही बोले,  सर हैप्पी गुडफ्रायडे।  मुझसे कुछ बोलते नहीं  बन पडा ! पर फिर धीरे से कहा, भाई; कहा तो गुड फ्रायडे ही जाता है, लेकिन है यह  एक  दुखद दिवस।   इसी दिन ईसा मसीह को मृत्यु दंड दिया गया था । किसी  क्रिश्चियन दोस्त को बधाई  मत दे बैठना.....!
#हिन्दी_ब्लागिंग 
ऐसे बहुत से  लोग हैं,  जिन्हें  सिर्फ छुट्टी  या  मौज - मस्ती  से  मतलब   होता है।  उन्हें  उस दिन  विशेष  के  इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई लेना - देना  नहीं होता !   ऐसा  ही  कुछ  "हादसा"  मेरे संस्थान में होते-होते बचा था जब एक भले आदमी ने "गुडफ्राइडे के उपलक्ष्य में" छुट्टी का नोटिस जारी कर दिया था।  समझाने   पर   वही  तर्क    कि जब गुड़ कहा जाता है तो इसका  मतलब अच्छा ही हुआ ना  ? और उन महाशय जी ने इतिहास में M.A. की डिग्री ले रखी थी !                                            
वैसे यह सवाल बच्चों को तो क्या बड़ों को भी  उलझन  में डाल  देता  है  कि जब  इस  दिन इतनी दुखद घटना घटी थी तो इसे "गुड़" क्यों कहा जाता है?  ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज - मस्ती से मतलब    होता    है,   उन्हें   उस दिन   विशेष के   इतिहास  या उसकी     प्रासंगिकता से कोई  मतलब नहीं होता अब इसी दिन को लें, सुबह की बधाई को याद रख, दूसरे दिन काम पर जा बहुतेरे लोगों से इस दिन के बारे में पूछने पर, इक्के - दुक्के को छोड कोई ठीक जवाब  नहीं  दे पाया।    उल्टा  उनका  भी यही प्रश्न  था  कि फिर इसे  गुड  क्यों  कहा जाता है। इसका यही  उत्तर है कि   यहाँ "गुड"   का  अर्थ  "HOLY"  यानी पावन  के अर्थ में लिया जाता है. क्योंकि  इस  दिन  यीशु   ने  सच्चाई  का साथ  देने और लोगों की  भलाई  के लिए, पापों  में डूबी  मानव  जाति    की  मुक्ति    के  लिए उसमें  सत्य,  अहिंसा,   त्याग और  प्रेम  की भावना जगाने के लिए अपने  प्राण त्यागे थे।  उनके अनुयायी उपवास रख पूरे दिन प्रार्थना करते हैं, और यीशु को दी गई यातनाओं को याद कर उनके वचनों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं। 
शुक्रवार का दिन बाइबिल में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुडा हुआ है जैसे सृष्टि पर पहले मानव का जन्म शुक्रवार को हुआ। प्रभु की आज्ञाओं का उल्लंघन करने पर आदम व हव्वा को शुक्रवार के दिन ही अदन से बाहर निकाला गया। ईसा शुक्रवार को ही गिरफ्तार हुए, जैतून पर्वत पर अंतिम प्रार्थना प्रभु ने शुक्रवार को ही की और उन पर मुकदमा भी शुक्रवार के दिन ही चलाया गया।

मंगलवार, 27 मार्च 2018

तम्बोला, हाउजी या बिंगो...खेल या जुआ !

अपने यहां सार्वजनिक रूप से मेले-ठेले या होली-दिवाली मिलन पर इसका आयोजन तो फिर भी समझ में आता है पर अभी पिछले दिनों  "हिंदू नव वर्ष" समारोह में इसे आयोजित होते देख, पता नहीं कुछ अजीब सा क्यों लगा !  हालांकि खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है ! पर पैसे दांव पे लगे होने से जूए का ही एक स्वरुप नहीं बन गया है.... ?
#हिन्दी_ब्लागिंग
तम्बोला, हाउजी या बिंगो, एक ही "बोर्ड खेल" के विभिन्न नाम। जो दुनिया भर में और भी नामों से खेला और पसंद किया जाता है। वैसे तो यह आयातित खेल वर्षों से हमारे यहां भी खेला जा रहा है, पर इधर कुछ सालों से इसकी लोकप्रियता दिन दूनी  रात चौगुनी बढ़ी है और अभी भी बढती ही जा रही है। पहले यह कहीं-कहीं क्लब
या पार्टियों  वगैरह में खेला जाता था। पर अब यह महिलाओं की "किटी पार्टियों" का एक आवश्यक अंग बनने के साथ-साथ मेले-ठेले-उत्सवों इत्यादि में भी अपनी पैठ बना चुका है। इसकी लोकप्रियता का कारण इसका रोमांचक स्वभाव, संभावना-युक्त और सरल होना है जिसके कारण कोई बच्चा भी इसे खेल सकता है।  

पर्ची या टिकट 
ऐसा माना जाता है कि इस खेल की ईजाद इटली में हुई थी। जहां से यह सारे विश्व में फ़ैल गया। उस समय इसे परिवार को एकजुट  खेल बतला कर प्रचारित किया गया था। पहले मौज-मस्ती के लिए इसे क्रिसमस के दौरान भी खेला जाता था और जीतने वाले को इनाम मिलता था। धीरे-धीरे इसका स्वरूप बदलता गया और अब यह पैसों से खेला जाने लगा है। दुनिया भर में यह कई तरह से खेला जाता है पर मूल पद्यति एक जैसी ही होती है। 

अपने यहां खेले जाने वाले इस खेल के दो भाग हैं ! एक तो खेलने वाले, जिनकी संख्या कुछ भी हो सकती है, उन्हें एक पर्चीनुमा टिकट मिलता है जिसकी तीन पंक्तियों में एक से नब्बे तक के अंकों में से कोई पंद्रह अंक,
हर पंक्ति में पांच के हिसाब से छपे होते हैं। दूसरा भाग खिलवाने वाले का होता है जिसमें एक या दो जने होते हैं।
उनके पास एक बोर्ड, जिसमें सिलसिलेवार एक से नब्बे अंकों से अंकित खाने बने होते हैं तथा एक कटोरेनुमा बर्तन होता है, कई जगह एक घूमने वाला यंत्र भी उपलब्ध होता है, जिसमें एक से नब्बे तक के अंकित छोटे-छोटे
नंबर वाले गुटके 
"डायस" या गोले होते हैं। खेल शुरू होने के पहले प्रत्येक खेलने वाले को एक निश्चित दर पर पर्ची बेचीं जाती है तथा संग्रहित पैसों से जीतने के विभिन्न मानक तय कर दिए जाते हैं और पूरी राशि को विभिन्न मानकों में बाँट दिया जाता है। जैसे किसी भी पंक्ति के पाँचों नंबर कट जाने पर कुछ राशि, पर्ची पर के किनारे के चारों नंबर कटने पर कुछ राशि, जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पांच अंक कट जाएं उसे कुछ राशि इत्यादि। उसके बाद जिस खिलाड़ी के सबसे पहले पूरे पंद्रह यानी सारे नंबर कट जाएं, जिसे "फुल हाउस" कहा जाता है, उसे विजेता माना जाता है और सबसे ज्यादा राशि उसी को मिलती है।   

बोर्ड 
खेल शुरू  होने पर खिलवाने वाला व्यक्ति  कटोरे में  से बिना  देखे एक  नंबर उठा, उसे सबको बतला कर बोर्ड में बने उसी नंबर की जगह में रख देता है। खेलने वाले की पर्ची में यदि वह नंबर हो तो वह उसे काट देता है नहीं तो अगले अंक का इंतजार करता है।  इसी तरह खेल तब तक चलता रहता है जब तक किसी का फुल हाउस ना हो जाए। फुल हाउस होने पर खिलाड़ी को अपनी पर्ची खिलवाने वाले को पेश करनी पड़ती है जो अपने बोर्ड से उसके नंबर मिला जीत निश्चित करता है। यदि कहीं चूक हुई होती है तो वह पर्ची "बोगी" कहलाती है और खेलने वाला बाहर हो जाता है।
नंबर निकलने वाली मशीन 

वैसे तो खेल मजेदार है, उत्सुकता, मनोरंजन, एकाग्रता, रोमांच, तत्परता, सरलता सभी कुछ समेटे हुए है ! पर पैसे दांव पे लगे होने से जूए का ही एक
स्वरुप बन गया है। अपने यहां सार्वजनिक रूप से मेले-ठेले या होली-दिवाली मिलन पर इसका आयोजन तो फिर भी समझ में आता है पर अभी पिछले दिनों "हिंदू नव वर्ष" समारोह में इसे आयोजित होते देख, पता नहीं कुछ अजीब सा क्यों लगा !    

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